शुभकामनाएं

शुभकामनाएं :- आप सभी को हमारी तरफ से 72वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।आप सभी हर्ष और उल्लाष के साथ इस पर्व को मनाये।और ध्यान दें - "कहीं भी जाये मास्क लगाएं" जय हिंद जय भारत।

भौरे की उलझन, एक मार्मिक कविता......


        दोस्तों ! आज मैं एक कविता लेकर आई हूं।जिसमे भौरे की दर्द को मार्मिक तरीके से रेखांकित किया गया है।यह कविता मेरे द्वारा रचित है।  जिसका शीर्षक है "भौरे की उलझन" 
कविता पढ़ने से पहले यह समझते है कि भौरे की उलझन क्या है ?
 भौरा सुबह-सुबह जब माली को देखता है तो वह चिंतित हो जाता है कि अब उसका साथ पुष्प से छूट जाएगा।इसलिए वह माली के पास जाता है और उसे पुष्प को न तोड़ने के लिए मनाता है पर उसे निराशा हांथ लगती है।तब वह पुष्प के पास जाता है और उससे बिछुड़ने का अपना दर्द प्रकट करता है ।यह देख पुष्प भौरे को समझाते हुवे कहता है कि .......
इस संसार में सुख दुख लगा रहता है हर सुख के बाद दुख आता है। यही संसार का नियम है।इसलिए मायूस होने की जरूरत नहीं है ।माली द्वारा मुझे तोड़ लिए जाने के बाद ,कुछ देर के लिए तुम्हे अकेला रहना पड़ सकता है पर जैसे ही अगली सुबह , सूरज की पहली किरण कलियों पर पड़ेंगी तो फिर से तुम्हे नए पुष्पों का साथ मिल जाएगा।
अब इसे  कविता के रूप में पढ़ते है और  इसका आनन्द लेते है।



                          •••भोरे की उलझन•••
                             (मार्मिक कविता)

सवेरा हुवा ,सूरज उगने लगा,
धरती से अंधियारा छटने लगा।
सूरज की किरण जब ज़मी पे पड़ी,
तब पुष्पों की कलियाँ खिलने लगी।

हवा का झोंका जब चलने लगी,
पुष्पों की डालियाँ हिलने लगी।
पास आने लगी ,गीत गाने लगी,
तब पुष्पों की खुशबू बिखरने लगी।

चिड़ियाँ जब चहचहाने लगी,
भौरें की आंख तब खुलने लगी।
ओस की बूंदें ,वो हटाने लगा ,
पंखों को तब ,वो सुखाने लगा।

हवा में जब ,वो उड़ने लगा ,
पुष्पों को देख ,वो आंगें बढ़ने लगा।
पास आने लगा ,पास जाने लगा,
पुष्पों के साथ ,वो भी गुनगुनाने लगा।

इतने में भौरें की नज़र, माली पे पड़ी,
जो लिए था,टोकरी और साथ मे छड़ी।
पास आता देख ,उसका दर्द झलकने लगा,
बिछुड़ने के गम में, वो रोने लगा ।

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भौरा, भाग कर माली के पास गया और बोला................................................

इन्हें न उखाड़ो, इन्हें न तोड़ो,
मेरे खतिर ,इन्हें अब छोड़ो।
इसके सिवा मेरा, कौन है यहां,
यहां से अब तुम, जावो वहां।
खुशियों के दामन में ,आग न लगाओ,
अपने रंज में , हमे न जलाओ।

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सुन भौरें की बात ,माली मायूस सा हुवा और बोला.........................................

अपने परिवार में 2 बच्चे मेरे,
भूखे-प्यासे बिस्तर पे पड़े।
खिलाने को, मेरे पास रोटी नही,
इसके सिवा, कोई दूजा रोजी नही।
उन्होंने 2 दिन से कुछ खाया नही,
मेरे सिवा उनका कोई साया नही।

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भौरा माली द्वारा जवाब पाकर निराश हो जाता है और पुष्प के पास जाकर कहता है…………..

तुझे तोड़ने ,माली इधर आ ही रहा,
टोकरी लिए , इधर बढ़ता जा ही रहा।
सिसकते-सिसकते वो,ये बात कहने लगा,
आँशुओं की धार ,   नेत्र से बहने लगा ।

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पुष्प , रोते हुए भौरे को देख कर रूआंसी हो जाती है और समझाते हुवे कहती है……….

देव पे चढूंगी या शैया पर पड़ूँगी,
अब करना है तुमको,अकेले गुज़ारा।
यहीं तक साथ है, 
मेरा    -   तुम्हारा   ।
अगली सुबह जब कलियाँ खिलेंगी,
फिर से साथ होगा,उनका - तुम्हारा।

                              - (स्वलिखित)

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